कल्याण की निर्भया पर उत्तर भारतीय नेताओं और समाजसेवकों की चुप्पी पर समाज में नाराजगी
- केंद्रीय मंत्री आठवले आए, लेकिन समाज का कोई विधायक पीड़ित परिवार से मिलने नहीं पहुंचा
- कल्याण के उत्तर भारतीय समाज में नाराज़गी
नारद वार्ता संवाददाता, ठाणे: कल्याण पूर्व में नाबालिग लड़की के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या ने न केवल क्षेत्र को झकझोर दिया है, बल्कि उत्तर भारतीय समाज में गहरा आक्रोश भी पैदा कर दिया है। समाज के लोग इस घटना पर उत्तर भारतीय समाज के नेताओं और कथित समाजसेवकों की चुप्पी और उदासीनता से आहत हैं। इस घटना समाज को लेकर उत्तर भारतीय नेताओं और समाजसेवकों की निष्क्रियता ने उनके इरादों और प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के बाद पीड़ित परिवार से मिलने के लिए केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले का आना हुआ।
इस वीभत्स घटना के बाद मुंबई और सटे उपनगर से उत्तर भारतीय समाज के मुंबई बीजेपी के उपाध्यक्ष अमरजीत मिश्र अकेले ऐसे नेता है, जो घटना की जानकारी के बाद आनन फानन में न सिर्फ कल्याण पहुंचे, बल्कि पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद के साथ ही उन्हें मुख्यमंत्री से मिलाया और उन्हें न्याय दिलाने के लिए मुख्यमंत्री से गुहार लगाई। उनके अलावा कोई भी उत्तर भारतीय समाज का नेता, समाजसेवक और उद्योगपति पीड़ित परिवार से मिलने नहीं आया और न ही कोई सार्वजनिक बयान देकर घटना की निंदा की। जो मुंबई, मीरा रोड, भायंदर, नवी मुंबई और ठाणे के साथ कल्याण के नेता और समाजसेवक कल्याण में मंच पर बैठने और स्वागत करवाने के लिए आते रहते थे, वे इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। उनके इस रवैये से कल्याण के उत्तर भारतीय समाज में गहरा आक्रोश व्याप्त है।
नेताओं की चुप्पी पर सवाल
कल्याण और आसपास के इलाकों में रह रहे उत्तर भारतीय समाज के लोगों को उम्मीद थी कि इस घटना के खिलाफ उनके नेता और समाजसेवक आवाज़ उठाएंगे। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। उत्तर भारतीय समाज का नेतृत्व करने का दावा करने वाले नेताओं जैसे विधायक विद्या ठाकुर, संजय उपाध्याय, और विधान परिषद सदस्य राजहंस सिंह पर इस मामले में निष्क्रियता का आरोप है। घटना के बाद न तो वे पीड़ित परिवार के पास पहुंचे और न ही उन्होंने न्याय की मांग करते हुए कोई ठोस कदम उठाया। उत्तर भारतीय संघ के अध्यक्ष संतोष सिंह और उनके पदाधिकारी, जो उत्तर भारतीयों की सबसे बड़ी संस्था का नेतृत्व करने का दावा करते हैं, ने भी इस मामले पर चुप्पी साध रखी है।
समाज का कहना है कि जो नेता चुनावों के समय उत्तर भारतीय समाज का रहनुमा बनकर टिकट मांगते हैं और मंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं, वे इस घटना पर न तो संवेदनशीलता दिखा सके और न ही अपनी जिम्मेदारी निभा सके। समाज के लोगों को इस चुप्पी से ऐसा प्रतीत होता है जैसे उन्होंने अपने राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी है और समाज के हितों को नजरअंदाज कर दिया है।
समाज की प्रतिक्रिया
कल्याण और आसपास के क्षेत्रों में उत्तर भारतीय समाज के लोग इस घटना को लेकर बेहद आहत हैं। वे नेताओं और समाजसेवकों के इस व्यवहार को समाज के प्रति उनकी असंवेदनशीलता और जिम्मेदारीहीनता का प्रतीक मानते हैं। समाज के कई सदस्यों का कहना है कि जो लोग मंच पर उत्तर भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, वे इस दुखद घटना में अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
नेताओं की जिम्मेदारी
उत्तर भारतीय समाज के कई लोगों ने इस घटना पर नेताओं से तुरंत कदम उठाने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग की है। समाज का कहना है कि यह समय पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करने का है। नेताओं और समाजसेवकों की चुप्पी ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया है और समाज में उनके प्रति अविश्वास बढ़ाया है।
समाज का संदेश
उत्तर भारतीय समाज के लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाओं पर समाज के नेताओं की निष्क्रियता को समाज के लोगों को गंभीरता से लेना होगा और उन्हें उनकी औकात दिखाना होगा। जो लोग समाज के नाम पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी करना चाहते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी केवल मंच पर भाषण देने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें हर स्थिति में समाज के साथ खड़ा होना होगा, खासकर जब समाज संकट में हो। यह घटना और इस पर नेताओं का रवैया समाज को गहरे सवाल करने पर मजबूर करता है। अगर नेता समाज के दु:ख-दर्द में भागीदार नहीं बन सकते, तो उनके नेतृत्व की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। उत्तर भारतीय समाज अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो वाकई उनके हितों और संवेदनाओं का सम्मान करे।